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RBI ने चेताया, हड़बड़ी में सरकारी बैंकों के निजीकरण से फायदे की बजाय होगा नुकसान

नई दिल्ली। भारतीय रिजर्व बैंक के बुलेटिन में प्रकाशित एक पेपर में कहा गया है कि बड़े पैमाने पर सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का जल्दबाजी में निजीकरण करना उचित नहीं होगा। यह अच्छे से ज्यादा नुकसान करेगा। 18 अगस्त को जारी बुलेटिन में कहा गया है कि अगर देश के अधिक से अधिक लोगों को वित्तीय सेवाएं प्रदान करने के उद्देश्य को ध्यान में रखा जाए तो हमारे सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने निजी बैंकों की तुलना में बेहतर प्रदर्शन किया है।

धन नियंत्रण बुलेटिन में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, बुलेटिन में प्रकाशित एक पेपर में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के निजीकरण के पक्ष और विपक्ष का विश्लेषण किया गया है। पेपर बताता है कि बैंकों के निजीकरण के कारण भारत जैसी विकासशील अर्थव्यवस्था को किन चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। कागज में कहा गया है कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने निजी बैंकों की तुलना में बेहतर वित्तीय समावेशन, बेहतर क्रेडिट प्रणाली और बेहतर दक्षता दिखाई है।

ग्रामीण क्षेत्रों में विफल रहे निजी बैंक
कागज में कहा गया है कि निजी बैंक अब तक ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में लोगों को बैंकिंग सेवाएं प्रदान करने में विफल रहे हैं। इस क्षेत्र के लोग बैंकिंग के लिए केवल सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों पर निर्भर हैं। इतना ही नहीं आर्थिक दबावों के बीच मौद्रिक नीति को सफल बनाने में सरकारी बैंकों ने भी अहम भूमिका निभाई है।

आरबीआई के बुलेटिन में कहा गया है कि राज्य के स्वामित्व वाले बैंकों ने कोविड-19 महामारी से उत्पन्न स्थिति का बहुत मजबूती से सामना किया है। हाल के वर्षों में, देश के सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में बाजार का विश्वास काफी बढ़ा है। ऐसे में बड़े पैमाने पर निजीकरण एक बार में उल्टा साबित हो सकता है

लाभ का मकसद नहीं
आरबीआई ने अपने बुलेटिन में लिखा है कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक केवल लाभ को अधिकतम करने के उद्देश्य से काम नहीं करते हैं। निजी क्षेत्र के बैंक अधिक से अधिक लोगों को वित्तीय सेवाएं प्रदान करने के आवश्यक लक्ष्य को शामिल नहीं कर पाए हैं। रिजर्व बैंक का मानना ​​है कि देश अब आर्थिक सोच से इतना आगे है कि निजीकरण ही हर विलय का रामबाण इलाज है। अब हम मानते हैं कि इस दिशा में आगे बढ़ते समय अधिक सावधानी और विचार-विमर्श की आवश्यकता है।

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